जब मैंने उससे मोहब्बत की तो इस शर्त पे नहीं की, की वो भी मुझे मोहब्बत करेगा…
मैं उसे पाना नहीं चाहती पर उसके बिना जीना भी नहीं आता…
अगर तुम्हें वो कहीं मिले तो उसे बोल देना-
“वो रोज़ तुम्हारे प्यार में दिये सी जलती है, किसी का घर सजाती है पर खुद को हर पल मिटाती है…
एक दिन उसकी रूह तुमसे मिलने ज़रूर आएगी,
तुम्हारी बेरुखी का सबब जाने बिना तो मौत भी उसको मिटा नहीं पायेगी”
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ये सुन के की इनमे तेरा नाम नहीं,
मैं लकीरें जला आई अपने हाथों की.
किसी गैर की और रुख ना करें ये कभी,
ऐसे तकदीरें बदल आई अपने ज़ज्बातों की.
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दिन से ना पूछो रात की बेहाली का आलम
उसको तो आदत है सूरज की बाँहों में छुप जाने की
अँधेरे के सिरहाने बैठी रात भी बड़ी ज़िद्दी है
इंतज़ार में है अपने दिन के आने की
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देर होने को है...
वक़्त रोने को है...
फिर ना कहना की- 'तुने बताया ही नहीं'
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किसी दीवार की ज़रुरत नहीं थी हमें रोकने के लिए,
दो लफ्ज़ प्यार के बोल देता तो आज मेरे दिल में भी धडकनें होती....
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यारों से ना पूछो इस ख़ामोशी का सबब
बस खैर मनाओ की अब तक क़यामत नहीं आई है,
निगाहों में ही देख लेना मेरी मौत का मंज़र
कुछ भी कहने में ऐ दोस्त तेरी रुसवाई है...
