Saturday, March 12, 2011

एक कोना दिल का



अब भी एक कोना 
बचा है शायद टूटने के लिए,
अब भी एक कोना बचा है, 

मुझे नहीं पता वो कहाँ छुपा है…
पर अब भी एक कोना बचा है.

मैं संत नहीं, न कोई देव हूँ,
फिर भी मुस्कुराकर उसके
सवालों के जवाब देती हूँ,
उसके बिखरे ख़्वाब चुनकर,
उसकी पलकों पर सजा देती हूँ…

किसी दर्द का एहसास बचा नहीं,
इतने ज़ख्म मिले दिल को मेरे,
पर जाने कैसे ढूंढ लेते हैं हमदम
एक कोना सही सलामत सा…

सच्चा यार है मेरा, वो प्यार है मेरा,
जो बेदिल मुझे रहने नहीं देता,
जब भी सोचती हूँ अब तो कुछ बचा ही नहीं,
वो एक कोना दिल का फिर से है तोड़ देता.

MCN: CF1TF-6HUUY-U3C69

सज़दा


सज़दा... तेरे लिए 

क्यूँ पत्थर बन के बैठा है,
तेरे दिल में कुछ अरमान नहीं,
मैं कितनी और सदाएं दूं,
सुन के भी तू चुप है कहीं.
मैं जब-जब राग सजाती हूँ,
तू तब-तब हाथ बढ़ाता है,
जाने क्या सोच के लेकिन तू,
वापस पीछे हट जाता है.

ना दूर हो मुझसे मेरे पिया… (2)

मैं तन हारी, मैं मन हारी,
मीरा बन बोलूं गिरधारी,
मजनू बन बोलूं, सब हारी,
तेरी खोज में ओ मेरे पीयू,
मैं कितने दरिया डूब गयी,
की मोती सा छुपा इस सागर में तू मिल जाये कहीं,
साँसों की तुझसे डोर जुडी,
और मैं पतंग सी आस्मां में उडी.

ना दूर हो मुझसे मेरे पिया… (2) 

तू रूठा जो तो माने न,
मैं जग छोडूं, जो तू कहदे हाँ,
तेरा एक पल का प्यार जो मिल जाये,
मैं जन्मों का जीवन कर दूं दान,
बस बोल दे मुझसे मेरे पीयू,
जो तुझ तक मुझको ले आये,
वो आग का दरिया पार करूँ.

ना दूर हो मुझसे मेरे पिया… (2)

मैं  कौनसी वो कसौटी दूं,
जो तू हँस के मुझको अपनाले,
अब कौनसा देव मनाऊं मैं,
जो तेरे दिल को बहलाले,
तेरी एक हंसी छूने के लिए,
मैं मीलों पैदल चल जाऊं,
तू ही दिखा दे मुझे मेरे पीयू,
वो राह जिससे तुझ को पाऊं.

 MCN: CN42B-JPSKK-1YWGK

मैं हो रही तबाह






मैं हो रही तबाह धीरे-धीरे,
मैं हो रही तबाह धीरे-धीरे,
अपने अन्दर ही बिखरती हुई, सिमटती हुई,
मैं कर रही दुआ धीरे-धीरे…

इसी ख़्याल में तसल्ली है दिल की,
लूटे हुए को क्या लूटेगा कोई,
यही सोच एक बार फिर लुट जाने की,
तमन्नाओं से दिल है सजा धीरे-धीरे…

आग में जिसका आशियाँ हो,
उसको क्या कोई राख करे,
यही सोच के शोलों में सेज लगा कर,
सो रही वहाँ धीरे-धीरे…

जो डूबा हुआ है गहराइयों में,
शायद उसको कोई मांझी डुबोने ना आये,
यही सोच के सागर में खो जाने को,
तोड़ रही मैं बांध धीरे-धीरे…

आँधियों में बर्बाद खड़ा है जो,
कोई झोंका उसको क्या तोड़े,
यही सोच के तिनके उड़ा के सब,
मैं खुद को कर रही फ़ना धीरे-धीरे…

यहाँ अब दोस्त ही कत्ल कर देते हैं,
दुश्मनों का कुछ काम नहीं,
जाने फिर क्यूँ ये दोस्त बनाये,
मेरा दिल-ए-बेवफ़ा धीरे-धीरे…

MCN: CFPHP-HCAL5-L4DHG

कर गया...



तुझ को पाने की दिल ने चाहत जो की,
बेगुनाह मैं बेचारा, गुनाह कर गया.
कभी तुझ को भी सदायें सुनाई दे,
सोच के दिल बेजुबान जाने क्या कह गया.

तुझ को पाने के दिन तो आते नहीं,
तुझ को खोने की रातें जवां कर गया.

किसी ज़रिया तुझ तक भी पहुंचे कभी,
वो किस्सा जो चंदा को बयां कर गया.

मेरी गुस्ताख़ बाँहों में तू होगी कभी,
जाने क्यूँ ख़्वाब निगाहों में बस गया.

रेत पर लिख कर तेरा नाम खूँ से,
उसे सीने से लगा मैं वहीँ मर गया.


MCN: C7QW3-CASKU-EB9E1

तू है कहाँ...




सुने ज़रा,  कोई दुआ 
तू है कहाँ, तू है कहाँ?
साँसों में मेरी बस तू गया है, 
जीना तुझ बिन जैसे सज़ा है. (मुखड़ा)

हौले-हौले, हौले-हौले, पास तू आकर,
छुप गया कहीं तू, अरमां जगाकर.
चाहा जो तुझ को, तो देखूं क्यूँ किसको?
सोचा जो तुझ को, तो सोचूं क्यूँ किसको?

रब से माँगू तुझ को मैं, हाथ उठाकर,
मिल जाने दे खुद में मुझको, तू मेरा सागर,
रूठा भला तू, क्यूँ मुझ से हुआ है.
कैसे बताऊँ, क्या हाल मेरा है.

पलकें नीचे - सांसें खींचे, चलती रहूँ मैं,
सूनी-सूनी दिल की गलियाँ, ढूंढा करूँ मैं,
दिख जाये शायद, तू मुझ को वहाँ पे,
यादों की दुनिया, में दिल बस गया है.

आजा तू आ,  माँगू दुआ…
तू है कहाँ, तू है कहाँ?

गीत/ भजन



तोहरी मुरली की धुन से कान्हा मैं तो हुई बावरी,
मुरली की धुन से कान्हा मैं तो हुई बावरी (2)
मोहे ना सुहाए तोसे,
मोहे ना सुहाए तोसे, किसी सखी का लगाव री…
तोहरी मुरली की धुन से कन्हा मैं तो हुई बावरी (2)

तोरे नैना मतवारे कान्हा, जादू ऐसा डारे रे,
नैना मतवारे कान्हा,
तोरे नैना मतवारे कान्हा, जादू ऐसा डारे रे,
तोरे नैनो के रंग से, मैं तो रंगी सांवरी…
मुरली की धुन से कान्हा मैं तो हुई बावरी (2)

छोड़ के मोरे गाँव की गलियां (2)
किस देस बसाया तूने राज ये अपना (2)
छोड़ के मोरे गाँव की गलियां
किस देस बसाया तूने राज ये अपना,
तेरी प्रीत की सुध है कान्हा, बाकि ना कोई काम री…

तोहरी मुरली की धुन से कन्हा मैं तो हुई बावरी,
मुरली की धुन से कान्हा मैं तो हुई बावरी (2)

MCN:CPBC2-YNHNM-CX782

शायरी




मुंदी आँखों में सुबह से शाम हुई, 
हमारी मोहब्बत तो मुफ्त में बदनाम हुई,
हम तो आबिद बने ही खुश थे उन निघाओं के,
बात लबों तक आई और बेहयाई सर पे इलजाम हुई.
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बेवफ़ा तेरे इश्क ने हमें कुछ ऐसे किया पागल,
आइना भी अब देखें तो नज़र आये तेरी शकल,
रूख्सत भी न ली तूने न अलविदा ही कहा,
बस इसीलिए अब तक उम्मीद है तू ना देगा दगा.
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इस दिल पे तुम्हारा नाम लिखा,
अपने अश्कों से हमने एक पैगाम लिखा,
तू ना समझ पाया उस स्याही के दर्द को,
तुझे तो हर लफ़्ज में इश्क-ए-नाकाम दिखा.
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छुपते नहीं है देखकर उनको,
जिनसे छुपा नहीं है राज़ कोई,
इतने नाज़ुक भी ना थे धागे रिश्तों के, 
की हमें पता न हो कब-कब तेरी आँख रोई,
फ़क्त नाम बदले हैं रिश्तों के, जज़्बात नहीं,
अब तक लिए खड़े हैं तेरे आँसुओं के लिए अपना अंचल वहीं.
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सपने



आँखें, आँखों में सपने,
सपने, कुछ बेगाने, कुछ अपने.
तेरे लिए मैंने बुने,
काँटों में से फूल चुने.
चाँदनी रातों में तुझे छुते हुए,
ये सपने मेरे अपने हुए.
कलियों से कच्चे मेरे सपने,
तेरी निगाहों की छाओं में पनपे.

वो पहली नज़र, वो पहली मुस्कान,
वो आखरी नज़र, वो आखरी सलाम,
सब कर दिए उन सपनों के नाम,
जो तेरे लिए मैंने बुने.

काट रहे ये मेरे रग-रग को,
तन्हाई तो सह लो, जो साथ रुलाए तो क्या करो?
ले जाओ ये सपने, ले जाओ ये सपने,
तुम्हारी अमानत जो छोड़ गए पीछे,
ले जाओ ये सपने....
तुम्हारे सपने... जो ना हुए मेरे अपने... 

फिर मिलेंगे...



ज़िन्दगी में कभी फिर मिलेंगे तो सही, 
उस दिन पूछेंगे सालों का हिसाब.
दुनिया इतनी बड़ी भी नहीं की तुम कहीं खो जाओ,
ज़िन्दगी इतनी छोटी भी नहीं की वो वक़्त ना आये जनाब.

ज़िन्दगी में कभी फिर मिलेंगे तो सही,
उस दिन खोलेंगे फिर वो पुरानी किताब.
पलटाकर देखेंगे उन पीले पन्नों को,
मिल जाये बिखरा हुआ हर सवाल का जवाब.

ज़िन्दगी में कभी फिर मिलेंगे तो सही,
उस दिन पियेंगे हम दोनों शराब.
होश में तो लब सिल जाते हैं,
शायद मदहोशी उठा दे सारे नकाब.

ज़िन्दगी में कभी फिर मिलेंगे तो सही,
उस दिन मौत पर भी होगा पूरा शबाब,
आज मेरी ज़मीं को खूँ से नहलाया है तूने,
तब सामने आ दिखाना तू अपना रुबाब.
ज़ख्म हम भी ताज़े रखेंगे तब तक,
और तू भी हरा रखना हर पुराना घाव.

शायरी




आँखें दिल का आइना होती हैं, आँखें जज़्बातों की जुबां होती हैं, 
जो कहती हैं आपकी आँखें, वो बात होठों से नहीं बयां होती है,
किसी और की नज़र से कभी उनको देखिएगा,
जो उन में है, वो बात सौ जामों में कहाँ होती है.
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किसी की हंसी को उसकी ख़ुशी ना समझो,
किसी की चुप्पी को उसकी बेबसी ना समझो,
हम नहीं भूलते हैं अपनी हदें,
बस हमारी बातों को तुम दिल्लगी ना समझो.
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हमने दिखाया खून-ए-जिगर तो ज़माने को रंग-ए-हिना लगा,
हम फ़ना हुए उनका नाम लेकर, और ज़माने को अंदाज़ शयराना लगा.
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सितम करने वाले भी कितने बेरहम होते हैं,
नींदें हमारी लेकर खुद चैन से सोते हैं,
किसी की याद में आज हमारी जान जाएगी,
ये दुआ है हमारी आज रात उन्हें भी नींद नहीं आएगी.
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ग़ज़ल



रात दिन - दिन रात,
मेरा चेहरा, उनके हाथ.
संभले रहना ऐ मेरे दिल अभी,
छुअन पागल ना कर दे तुझ को कहीं.

ये खुला आसमां, खूबसूरत जहाँ.
बिखरे तारे कहीं, चाँद की रोशनी.

बंद आँखें, होंठ खुले, जज़्बातों की छावं तले,
मिले आज हम-तुम, फिर आज मिले,
रहने दो अभी ये कुछ फासले.

खुश्बूँओं की गली, वो हर खिलती कली, 
भरलो साँसों में तुम एक नयी ज़िन्दगी.

मिटीं दूरियां, वो आगे बढ़े,
मोतियों की लड़ी, टूट के बिखरी,
मर गए हम शरम से खड़े ही खड़े. 

किस्से...



इस बर्फ पर जम गए थे जो किस्से,  
आज फिर से धुप से पिघलकर मेरे रूबरू हुए.
तेरी सदाएँ जो इन वादियों में चुप थी पड़ी,
आज फिर गूँज उठी ताज़ी पुकार की तरह.
वो लम्हे जो बिताये थे इन टूटी सीढियों पे,
आज फिर से मेरी सबसे बड़ी आरज़ू हुए.

अब भी देखता हूँ उस खिड़की को बड़ी हसरत से,
जहाँ मुझे देखने को तुम थे कभी खड़े हुए.
इस बाग़ का वो पेड़ भी आज रोता है,
जिसके पत्तों पर तुने अपने नाम थे लिखे.
अब भी जाकर मैं वहां बैठता हूँ,
की आज फिर मिल जाएँ तेरे अक्षर बर्फ में दबे हुए.

मचल उठे हैं हाथ आज फिर से मेरे,
की सुलझाऊँ एक बार वो तेरे गेसू खुले हुए.
वादा करके देर करना तो आदत है तेरी,
पर न आकर आज वादा है तोड़ा तुने.
क्या अब पूरा होगा ये वादा कभी,
जब हम दोनों में एक ज़िन्दगी के फासले हुए.

तुझे देखा है!



भुजते दिए की कालिमा में, कई बार तुझे देखा है,
उगते सूरज की लालिमा में, कई बार तुझे देखा है.

अपने बहते आंसुओं के, पार तुझे देखा है,
मुझे छूने की कोशिश में, एक बार तुझे देखा है.

चंदा को जब भी देखूं, लगे हर बार तुझे देखा है,
हर झपकन के साथ लगे, बार-बार तुझे देखा है.

हर पल यही सोचूं मैं, कहाँ यार तुझे देखा है,
बिन देखे ही करूँ इंतज़ार, ऐसा प्यार कहीं देखा है.

ग़ज़ल


खुबसूरत हंसी जो ये शाम हुई,
ज़िन्दगी आज इस पे फ़िदा हो गयी.

इस शाम में कितनी हैं तन्हाईयाँ,
जैसी उस वक़्त थी मैंने महसूस की,
उन आँखों की थीं जो नर्मियां,
बस वैसी ही आज ये धूप लगी.

वक़्त ठहरा लगे आज फिर से मुझे,
बस समय ही न जाने क्यूँ गुज़रता गया,
उस वक़्त थे हाथों में हाथ कभी.
आज नज़र भी उठाने से डरता है दिल.

तुम कहीं और थे, हम कहीं और थे,
तेरा कोई हमसफ़र, मेरा कोई हमसफ़र;
ज़िन्दगी ने फिर वापिस मिलाया है क्यूँ?
ये सोया सा दर्द जगाया है क्यूँ?

किस्मत ने दिया है ये मौक़ा हमें,
ये मौक़ा हर किसी को मिलता नहीं,
ये मौक़ा हसीं, ये मौक़ा जवान,
फिर दो दिलों की वही दास्ताँ.

आओ पूरी करें वो कहानी अभी,
अधूरी रही थी जो कहीं पर कभी,
आ समां जा तू मुझ में अब इस तरह,
की ना सहनी पड़े फिर जुदाई कभी.