Saturday, March 12, 2011

ग़ज़ल


खुबसूरत हंसी जो ये शाम हुई,
ज़िन्दगी आज इस पे फ़िदा हो गयी.

इस शाम में कितनी हैं तन्हाईयाँ,
जैसी उस वक़्त थी मैंने महसूस की,
उन आँखों की थीं जो नर्मियां,
बस वैसी ही आज ये धूप लगी.

वक़्त ठहरा लगे आज फिर से मुझे,
बस समय ही न जाने क्यूँ गुज़रता गया,
उस वक़्त थे हाथों में हाथ कभी.
आज नज़र भी उठाने से डरता है दिल.

तुम कहीं और थे, हम कहीं और थे,
तेरा कोई हमसफ़र, मेरा कोई हमसफ़र;
ज़िन्दगी ने फिर वापिस मिलाया है क्यूँ?
ये सोया सा दर्द जगाया है क्यूँ?

किस्मत ने दिया है ये मौक़ा हमें,
ये मौक़ा हर किसी को मिलता नहीं,
ये मौक़ा हसीं, ये मौक़ा जवान,
फिर दो दिलों की वही दास्ताँ.

आओ पूरी करें वो कहानी अभी,
अधूरी रही थी जो कहीं पर कभी,
आ समां जा तू मुझ में अब इस तरह,
की ना सहनी पड़े फिर जुदाई कभी.

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