Saturday, March 12, 2011

सपने



आँखें, आँखों में सपने,
सपने, कुछ बेगाने, कुछ अपने.
तेरे लिए मैंने बुने,
काँटों में से फूल चुने.
चाँदनी रातों में तुझे छुते हुए,
ये सपने मेरे अपने हुए.
कलियों से कच्चे मेरे सपने,
तेरी निगाहों की छाओं में पनपे.

वो पहली नज़र, वो पहली मुस्कान,
वो आखरी नज़र, वो आखरी सलाम,
सब कर दिए उन सपनों के नाम,
जो तेरे लिए मैंने बुने.

काट रहे ये मेरे रग-रग को,
तन्हाई तो सह लो, जो साथ रुलाए तो क्या करो?
ले जाओ ये सपने, ले जाओ ये सपने,
तुम्हारी अमानत जो छोड़ गए पीछे,
ले जाओ ये सपने....
तुम्हारे सपने... जो ना हुए मेरे अपने... 

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