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| सज़दा... तेरे लिए |
क्यूँ पत्थर बन के बैठा है,
तेरे दिल में कुछ अरमान नहीं,
मैं कितनी और सदाएं दूं,
सुन के भी तू चुप है कहीं.
मैं जब-जब राग सजाती हूँ,
तू तब-तब हाथ बढ़ाता है,
जाने क्या सोच के लेकिन तू,
वापस पीछे हट जाता है.
ना दूर हो मुझसे मेरे पिया… (2)
मैं तन हारी, मैं मन हारी,
मीरा बन बोलूं गिरधारी,
मजनू बन बोलूं, सब हारी,
तेरी खोज में ओ मेरे पीयू,
मैं कितने दरिया डूब गयी,
की मोती सा छुपा इस सागर में तू मिल जाये कहीं,
साँसों की तुझसे डोर जुडी,
और मैं पतंग सी आस्मां में उडी.
ना दूर हो मुझसे मेरे पिया… (2)
तू रूठा जो तो माने न,
मैं जग छोडूं, जो तू कहदे हाँ,
तेरा एक पल का प्यार जो मिल जाये,
मैं जन्मों का जीवन कर दूं दान,
बस बोल दे मुझसे मेरे पीयू,
जो तुझ तक मुझको ले आये,
वो आग का दरिया पार करूँ.
ना दूर हो मुझसे मेरे पिया… (2)
मैं कौनसी वो कसौटी दूं,
जो तू हँस के मुझको अपनाले,
अब कौनसा देव मनाऊं मैं,
जो तेरे दिल को बहलाले,
तेरी एक हंसी छूने के लिए,
मैं मीलों पैदल चल जाऊं,
तू ही दिखा दे मुझे मेरे पीयू,
वो राह जिससे तुझ को पाऊं.

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