Saturday, March 12, 2011

शायरी



बेरुख़ी पे अपनी उनको बहुत नाज़ है,
मेरी मुहब्बत का तो ये आगाज़ है,
अंजाम का तो अभी कुछ सोचा नहीं,
तकदीर पे भी अपनी ज़्यादा भरोसा नहीं,
फिर भी उम्मीदों के तारे आँखों में टिमटिमाते हैं,
एक दिन उनका भी नज़र-ए-करम होगा,
झोंके हवा के चुपके से कह जाते हैं.
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तेरे जाने से कोई शिकवा कैसे करे,
बेवफ़ा तो हम निकले,
क्यूँ अब तक धड़क रहा है ये खाली दिल,
वफ़ा तब होगी जब तेरे जाने के साथ मेरी जान निकले.
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उनसे कह दो हम तो उनकी हर कसम निभा लेते,
बिन उनके ये ज़िन्दगी बिता लेते,
बेवफा तो ये सांसें थी जो दागा दे गयीं,
एक लाश में हमारा क्या काम, जाते-जाते ये कह गयीं...
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बेवफाई हमारी आदत नहीं,
और वफ़ा वो कर न सके,
अब तड़पना हमें ही है उम्र भर,
की ना तो हम जी सके ना मर सके.

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जाओ अब हम भी देखें,
तुम कब तक यूँ रहोगे.
मरने के बाद मेरे,
एक 'आह' तो भरोगे,
थी एक दीवानी, इतना तो तुम कहोगे,
ठंडक जो देगी रूह को,
वो 'आह' होगी तेरी,
और बस यही तो प्यार की, जीत होगी मेरी.
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