आज फिर से धुप से पिघलकर मेरे रूबरू हुए.
तेरी सदाएँ जो इन वादियों में चुप थी पड़ी,
आज फिर गूँज उठी ताज़ी पुकार की तरह.
वो लम्हे जो बिताये थे इन टूटी सीढियों पे,
आज फिर से मेरी सबसे बड़ी आरज़ू हुए.
अब भी देखता हूँ उस खिड़की को बड़ी हसरत से,
जहाँ मुझे देखने को तुम थे कभी खड़े हुए.
इस बाग़ का वो पेड़ भी आज रोता है,
जिसके पत्तों पर तुने अपने नाम थे लिखे.
अब भी जाकर मैं वहां बैठता हूँ,
की आज फिर मिल जाएँ तेरे अक्षर बर्फ में दबे हुए.
मचल उठे हैं हाथ आज फिर से मेरे,
की सुलझाऊँ एक बार वो तेरे गेसू खुले हुए.
वादा करके देर करना तो आदत है तेरी,
पर न आकर आज वादा है तोड़ा तुने.
क्या अब पूरा होगा ये वादा कभी,
जब हम दोनों में एक ज़िन्दगी के फासले हुए.
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