Saturday, March 12, 2011

मैं हो रही तबाह






मैं हो रही तबाह धीरे-धीरे,
मैं हो रही तबाह धीरे-धीरे,
अपने अन्दर ही बिखरती हुई, सिमटती हुई,
मैं कर रही दुआ धीरे-धीरे…

इसी ख़्याल में तसल्ली है दिल की,
लूटे हुए को क्या लूटेगा कोई,
यही सोच एक बार फिर लुट जाने की,
तमन्नाओं से दिल है सजा धीरे-धीरे…

आग में जिसका आशियाँ हो,
उसको क्या कोई राख करे,
यही सोच के शोलों में सेज लगा कर,
सो रही वहाँ धीरे-धीरे…

जो डूबा हुआ है गहराइयों में,
शायद उसको कोई मांझी डुबोने ना आये,
यही सोच के सागर में खो जाने को,
तोड़ रही मैं बांध धीरे-धीरे…

आँधियों में बर्बाद खड़ा है जो,
कोई झोंका उसको क्या तोड़े,
यही सोच के तिनके उड़ा के सब,
मैं खुद को कर रही फ़ना धीरे-धीरे…

यहाँ अब दोस्त ही कत्ल कर देते हैं,
दुश्मनों का कुछ काम नहीं,
जाने फिर क्यूँ ये दोस्त बनाये,
मेरा दिल-ए-बेवफ़ा धीरे-धीरे…

MCN: CFPHP-HCAL5-L4DHG

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